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दरार

दरार ……!
दरार यूँ ही नहीं पड़ जाती है रिश्तों में !
ज़िम्मेदार होतीं हैं बेवजह की अपेक्षाएँ,आशाएँ,
जो हम थोप देते हैं औरों पर, अपनी इच्छाएँ ।
और देख लेते हैं दिवा स्वप्नों को –
हम बाँध देते हैं जिनसे चुपचाप अपनों को ।।
दरार यूँ ही नही पड़ जाती है रिश्तों में ,।
जब हम पाल लेते हैं मन में सैकड़ों शंकाएँ,
या फिर उलझ जाते हैं , अविश्वास की जड़ों में ।
भूल जाते हैं जब सारा प्रेम क्षणों में ।।
और देखने लगते हैं केवल बुराइयाँ, धीरे धीरे दूर हो जाती हैं सच्चाइयाँ ।
और रह जातें हैं फिर जलते हुए मन , व्यर्थ के जाल में उलझते हुए हम , स्वर्ग से घर को वीराना बना देते हैं ।
ख़ून के रिश्तों को बेगाना बना देते हैं, खून के रिश्तों को बेगाना बना देते हैं ।।

।। आशुतोष त्रिपाठी ।।

 

 

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ख़ता

क्या खता थी मेरी वो मुझको बताता भी नहीं ।
साथ रहता है मगर साथ निभाता भी नहीं ।।

पहले आदत सी लगा दी मुझे उसने अपनी ।
अब वो कहता है कि तुझसे मेरा नाता ही नहीं ।।

प्यार करता है मुझे इतना यकीं है लेकिन ।
अब हँसाता भी नहीं और रुलाता भी नहीं ।।

दिल पे पत्थर भी कभी काश मैं रख लूँ , लेकिन ।
दिल मे रहता है कभी दूर वो जाता ही नहीं ।।

दिल की हालत का बयाँ कैसे करें, “वो ” राही !
साथ रहता भी नहीं छोड़ के जाता भी नहीं ।।

” आशुतोष त्रिपाठी “

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Poetry

मुसकान

कुछ बात अजब सी होती है बच्चों की मुस्कान में ।
उनकी अपनी ही दुनिया है , जहाँ कल्पित पात्र विचरते हैं-
‌इस दुनिया की सच्चाई से, सच्ची वो कल्पित दुनिया है ।
जहाँ कोई झूठा दम्भ नहीं, जहा कोई लोभ प्रपंच नहीं ।
बस अपने मन की करना है , बस अपने मन की सुनना है।
वहाँ कोई ऊँच और नीच नही , सब एक से हैं सब बालसखा ।
न ही भविष्य की चिंता है , न भूत से कोई शिकवा गिला ।
बस आज ही उनका सब कुछ है , और आज में ही वो जीते हैं।
न ही वो हँसी छुपाते हैं और न ही आंसू पीते हैं ।।

लेकिन हम उनकी दुनिया को अपनी दुनिया से मिलाने की,
हर संभव कोशिश करते हैं उनको अपना सा बनाने की।
उनको भी हम इस दुनिया की घुड़दौड़ में शामिल करने का ,
सारा प्रयास कर लेते हैं इस दौर में शामिल करने का ।।
शायद विचार के लायक है , ये एक ज्वलंत प्रश्न मेरा –

किस ओर को जाना है हमको , किस लक्ष्य की खातिर यह फेरा-
दिन रात लगाते हैं हम सब , किस बात ने हमको है घेरा ।
धरती पर आने का मकसद क्या केवल अर्थ कमाना है ?
या आपस मे यूँ लड़ भिड़ कर , मारना है और मर जाना है ।।
यह तथ्य विचारणीय होगा , किस ओर चले हैं हम मानव।
यह मार्ग प्रगति का है या फिर, हम आज चले बनने दानव ।।
“आशुतोष त्रिपाठी”

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कुछ गीत गुनगुनाए कुछ फ़लसफ़े लिखे ।

 

कुछ गीत गुनगुनाए कुछ फ़लसफ़े लिखे ।
तेरे लिए ए ज़िन्दगी कितने जतन किये ।।

लाखों की भीड़ में जो अपना लगे कोई ।
उस शख्स के बिना भला कैसे कोई जिए ।।

दिन रात तराशा था उस बुत को, दिल ही दिल में ।
लेकिन अब अजनबी सा वो क्यों है मेरे लिए ।।

दस्तूर है ये कोई , या बदगुमां सी साजिश ।
हर कोई जी रहा है , लेकिन बिना जिए ।।