उन्नति के पथ पर !
सदियों पूर्व चला था मानव ।
कितने झंझावातों को ,
अगणित शीत- आतपों को,
सहता ,चीरता- नद सागर को,
करता सुगम पर्वतों को!!
किन्तु, किंचित अब भटक गया, तृष्णा-लिप्सा में अटक गया ।
आज भोला सा यह मानव,
अग्रसर बनने को दानव,
छोड़कर स्वेच्छा से निज धर्म
भूलकर अब सारे सत्कर्म,
हुआ अनुगामी अब किसका
स्वयं ही विद्ध किया निज मर्म ।
प्रकृति में जन्मा, पला-बढ़ा,
दूर उससे ही किन्तु खड़ा
क्षत-विक्षत करता है देखो
शश्यवसना इस धरती को ।
स्वयं को देता है संताप,
नित्य- प्रति करता है ये पाप,
मृग पिपासा के वश होकर,
चेतना अब सारी खोकर।
तुच्छ माया के वश होकर,
कौन सा करता ये आलाप?
क्यों प्रकृति का लेता यह शाप।
प्रगति आवश्यक है कितनी,
करेगा निर्णय इसका कौन !
प्रगति क्या है, कृत्रिम जीवन?
और केवल क्या निज पोषण!
नहीं! यह वसुधा अपनी है,
सदृश माँ के पोषण करती,
हमें निशि दिन धारण करती।
हमारा भी है यह कर्तव्य,
करें इसका भी हम पोषण,
सभी जीवों में सबसे श्रेष्ठ,हैं हम सब मानव प्राणि-विशेष !!
रखें हम मिलकर इसका मान,
बनें हम फिर से जीव महान !!
बनें हम फिर से जीव महान !!
“आशुतोष त्रिपाठी “