ख्वाबों के सुनहरे पन्नों से, कुछ वक्त तलाशा; सोचा! फिर खामोश रह गया ।
आखिर क्या मैने पाया है ? जीवन के बीते पन्नों में क्या कोई सुनहरी छाया है!
जो स्वर्णिम सी हो चमक उठे, मेरा मन फिर से चहक उठे।
पर ऐसा किंचित हो न सका आशा तरु पुष्पित हो न सका। जीवन नद में बहता ही रहा, सौ सौ आतप सहता ही रहा ।
भावुकता के तूफानों में, बागों में कभी वीरानों में।
रुकता भी गया, चलता भी गया , सुनता भी गया, कहता भी गया ।।
ख्वाबों के सुनहरे पन्नों से …..
तंद्रा से जब बाहर आया खुद को वीरान खड़ा पाया, फिर सोचा …
बिन किये कहाँ कुछ होता है,
हर कोई स्वप्न पिरोता है,
पर हार वही बन पाता है, जो पुष्प स्वयं बिंध जाता है!
ख्वाबों के सुनहरे पन्नों से ……..