Categories
Poetry

“याद “

फिर से याद तुम्हारी आयी!
फिर से लाख फसाने लायी।
चार क़दम की रंगरलियां थीं
फिर मीलों तन्हाई …..!
फिर से याद तुम्हारी आयी !
काश मैं उस दिन कह पाता, तुम रुक जाओ,
काश ये समझा पाता तुमको दुनियाँ से ना घबराओ!
पर किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ सा रहा देखता जाते तुमको,
पत्थर सा मैं रहा निरखता अविरल नीर बहाते तुमको ।
अब भी मन पर बोझ वही है, जाकर फिर तुम ना आईं !!
फिर से याद तुम्हारी आयी…..

रिक्त पड़ा है जीवन तबसे, जब तुमको था हँसते देखा;
अन्तिम बार वो जब अधरों को लज्जाशील लरज़ते देखा।
किन्तु दोष अब किसका मानूँ , ये मेरी ही नादानी थी,
हाथ तुम्हारा क्यूं कर छोड़ा, जान भी जाती गर जानी थी !!
वही भोगता हूँ अब, “राही” जो नियती है ले आयी….
फिर से याद तुम्हारी आयी…
“आशुतोष त्रिपाठी”