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Poetry

बड़प्पन


बचपन से किसको प्रेम नहीं !
कौन जल्दी बड़ा होना चाहता है !!
किन्तु अपेक्षाएँ लोगों की,और तुलनाएँ औरों से
कर देती हैं बड़ा; समय से पहले ।

कौन रोता नहीं है छुप छुप कर !
या कि दिल मचलता नहीं है माँ के आंचल को?
किन्तु ज़िम्मेदारियाँ या की विकलताएँ बड़ेपन की ?
कर देती हैं बड़ा समय से पहले, ज़िम्मेदारियाँ या कि विकलताएँ !!

जब कोई छोटा आ जाता है घर में।
तो घोषित हो जाता है स्वतः बड़प्पन !
और थोप – सी दी जाती है- गंभीरता, सहिष्णुता, सूझ-बूझ; न जाने क्या क्या !
और दबा दी जाती हैं, अंतर्मन की चंचलताएँ।
कर देती हैं बड़ा,समय से पहले ज़िम्मेदारियाँ या विकलताएँ !!

उम्र के पहले पड़ाव में भी कभी, कोसों दूर का वनवास; क्या विस्मृत हो जाता है बचपन का उल्लास?
नई, अनजान,वीरान दुनियाँ में चुपचाप; सहन-कर नित्य नए संताप।
चलाने की खातिर घर बार, स्वयं ही मिटना पड़ता है,भुलाकर सुरमय आकांक्षाएं।
कर देती हैं बड़ा समय से पहले, ज़िम्मेदारियाँ या विकलताएँ !!

स्वयं बन कर भी नींव की ईंट, सजाकर घर के कंगूरे, हृदय में अनुभव कर संतुष्टि,
सजाकर सबके सपनों को; समझकर उनको अब अपना, उन्हें अपनाना पड़ता है।
उम्र से पहले ही पडप्पन की चादर ओढ़कर, बड़े का फ़र्ज़ निभाना पड़ता है।
क्योंकि कर देती हैं बड़ा, समय से पहले; ज़िम्मेदारियाँ या विकलताएँ !!
आदरणीय अग्रज को समर्पित🙏
आशुतोष त्रिपाठी।।