बावरा है मेरे मन तू ::::
बावरा है मेरे मन तू , तुझको क्या कुछ ज्ञात है ?
तू अभी कच्चा खिलाडी सारा जग निष्णात है !
भावनाओं के लिए कोई जगह खाली नहीं ,
स्वार्थपरता में यहां डूबा हुआ हर गात है !
रोज मानवता यहां सूली चढाई जा रही न्याय की हर रोज अब हस्ती मिटाई जा रही,
झूठ , मक्कारी की जै-जैकार होती रोज है ,
आज अच्छाई उठाती, इन सभी का बोझ है ।
राह पर जीवन की ‘राही’ हाँफता-सा चल रहा
सत्य की राहों पे चल कर पाँव उसका जल रहा
वो मजे से जा रहा है झूठ जिसके साथ है !
तू अभी कच्चा खिलाडी सारा जग निष्णात है!
बावरा है मेरे मन तू ,:
”आशुतोष ”