लो फिर वो कहानी याद आई ,
हर बात पुरानी याद आई ।
वो खेल पुराने याद आये ,
गलियाँ वो सुहानी याद आई ।
वो हरे भरे खेतों में जब गेहूँ की बालियाँ हसती थीं
हम नन्हें बच्चों की टोली जब उनमें जाकर छिपती थीं ।
सरसों के पीले फूलों की वो बाग़ सुहानी याद आई ..
वो दादी माँ की गोद में जब हम सर रखकर सो जाते थे,
कुछ काँपते से जब हाथ उनके जो बालों में फिर जाते थे ।
जन्नत से हसीन माँ के आँचल की छाँव सुहानी याद आई ….
वो खट्टे आमों पर ढेले बरसाती बच्चों की टोली
वो गाती कोयल जामुन पर वो मोर पपीहों की टोली।
वो बाँस के झुरमुट में जुगनुओं की मनमानी याद आई. ….
कितना अच्छा होता फिर से एक बार वो दिन वापस आता
इस समझौते के जीवन में कुछ पल तो खुद को जी पाता ?
पर सपना सा सब लगता है,
अब कहाँ वो दिन फिर आएगा !
जो फिर से गांव की झोली में बचपन के दिन दे जाएगा ………….।
”आशुतोष”