Month: May 2019
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टूटा फूटा मकान है तो सही !!
टूटा फूटा मकान, है तो सही ।
अपने घर का गुमान है तो सही।।
रोशनी थोड़ी छन के आती है।
धुँधला सा रौशदान है तो सही !!
सब्र पे सब्र पिए जाता हूँ ।
हाथ में कोई जाम है तो सही !
ज़िल्द को खा चले हैं अब दीमक ।
बिखरे पन्ने तमाम हैं तो सही !
आज वो साथ नहीं है तो क्या !
उसके किस्से तमाम हैं तो सही !!
चलते जाते हैं, सफ़र खत्म नहीं होता है।
शुक्र है साथ कोई, राज़दान है तो सही !!
“आशुतोष त्रिपाठी”
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वक़्त को उस से कुछ गिला तो था
वक़्त को उस से कुछ गिला तो था,
वरना उस रोज़ वो मिला तो था ..!
लोग कहते हैं अब वो तन्हा है ..?
साथ मे उसके काफिला तो था ..!
शायद इसको ही जीस्त कहते हैं,
एक रोटी का मामला तो था ..!
नफ़रतें प्यार में बदलीं न कभी ..
अच्छा खासा घुला मिला तो था ..!
बिन पिये रिन्द का यूँ लौट आना ..?
आज मैखाना भी खुला तो था …!
“आशुतोष त्रिपाठी”