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ऐसा माँ ही कर सकती है……..

कोई नज़्म लिखूँ! या गीत लिखूँ!या कोई कविता लिख जाऊँ?
अब तू ही बता मुझको ए दिल, कैसे मैं तुझको बहलाऊँ?

जाने कबसे मैं बैठा हूँ, इस बूढ़े बरगद के नीचे,
कुछ सोच रहा हूँ , या गुमसुम बस देख रहा आँखे मीचे।
खुलता ही नहीं कुछ आख़िर क्या, गड़बड़-झाला है अंतस में!
थोड़ा विमूढ़ – सा आखिर क्यूँ मैं बैठा हूँ मुट्ठी भींचे ?

हाँ याद आया! थोड़ा पहले एक नौजवान बेटे ने जब, माँ को यतीमखाने के दर पर रोता यूँ ही छोड़ दिया।
वो चला गया पीछे न मुड़ा, माँ रही देखती उसे, निरंतर ओझल होने तक अपलक ..!
फिर मैले आँचल से आँखों के गीले कोरों को पोंछा,
मन ही मन फिर आशीष दिया, अक्षम्य कार्य को क्षमा किया..
ऐसा माँ ही कर सकती है, आशीषों से भर सकती है!
चाहे सौ कष्ट पड़ें सहने, सौ बार उन्हें सह सकती है ऐसा माँ ही कर सकती है !!

“आशुतोष त्रिपाठी”

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Nazm Poetry

फिर भी जिये जाते हैं..

जुर्म औरों पे नहीं, ख़ुद पे किये जाते हैं ।
रोज़ मरते हैं मगर , फिर भी जिये जाते हैं।।

आह भरते हैं मगर अश्क़ नहीं दिखते हैं।
वक़्त बे वक़्त उन्हें याद किये जाते हैं ।।

बेरुखी इसको कहें, या कहें उनकी आदत।
टूट के मिलते तो हैं, पल में बिखर जाते हैं।।

आईने जैसा है हर शख़्श, गौर से देखो … ।
सबकी आंखों में अपने अक्स नज़र आते हैं।।

बारहा मिलने से, रिश्ते नहीं कायम होते ।
पल में लोगों के खयालात बदल जाते हैं..।।

वो सुख़नवर है, उसपे प्यार बहोत आता है।
ये और… है कि उसे संगदिल बुलाते हैं…!!

“आशुतोष त्रिपाठी”