जुर्म औरों पे नहीं, ख़ुद पे किये जाते हैं ।
रोज़ मरते हैं मगर , फिर भी जिये जाते हैं।।
आह भरते हैं मगर अश्क़ नहीं दिखते हैं।
वक़्त बे वक़्त उन्हें याद किये जाते हैं ।।
बेरुखी इसको कहें, या कहें उनकी आदत।
टूट के मिलते तो हैं, पल में बिखर जाते हैं।।
आईने जैसा है हर शख़्श, गौर से देखो … ।
सबकी आंखों में अपने अक्स नज़र आते हैं।।
बारहा मिलने से, रिश्ते नहीं कायम होते ।
पल में लोगों के खयालात बदल जाते हैं..।।
वो सुख़नवर है, उसपे प्यार बहोत आता है।
ये और… है कि उसे संगदिल बुलाते हैं…!!
“आशुतोष त्रिपाठी”