अनोखा शख़्स है बस मुस्कुराता जा रहा है।
या फ़िर, ग़म को भुलाता जा रहा है …?
उसे होठों को सीना आ गया होगा ।
तभी तो ग़म उठाता जा रहा है ..!
हवा का रुख़ पता है उसको फिर भी।
वो क्यूँ मिट्टी उड़ाता जा रहा है…?
सुना है तैरना आता है उसको…!
मगर साहिल से क्यों घबरा रहा है..?
यक़ीनन वो बहोत तन्हा है फिर भी…
खुशी के गीत गाता जा रहा है …!!
मैं जब से गाँव वापस आ गया हूँ …
शहर फिर याद आता जा रहा है ..!!
आशुतोष त्रिपाठी.