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तेरे ग़म से दूर जाना चाहता हूँ..!!

अब मैं तुझको भूल जाना चाहता हूँ
तेरे ग़म से दूर जाना चाहता हूँ !

रोशनी आख़िर मिलेगी तेरी कब तक!
अपनी लौ से जगमगाना चाहता हूँ !!

तू नहीं है ज़िंदगी में ये गलत है !
फिर भी दिल को सच दिखाना चाहता हूँ!!

बे -सहारा, बे -अलम, बे-जीस्त होकर ।
शून्य में जीवन बिताना चाहता हूँ ..!

सोचता हूँ मैं भी अब थोड़ा जिऊँगा..!
ये यकीं खुद को दिलाना चाहता हूँ ..!!

बस बहोत बर्बादियों से कर ली यारी ।
अब मैं गुलशन को सजाना चाहता हूँ..!!

एक ख्वाहिश है अधूरी भी तो क्या है ..!
हर तमन्ना अब मिटाना चाहता हूँ..!!
आशुतोष त्रिपाठी

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वादा

काम मुश्किल था बड़ा फिर भी निभाया हमने,
कई बिखरे हुए रिश्तों को सजाया हमने ।।

धूल थी जम चुकी ज़ज़्बात मरने वाले थे,
एक कोने में पड़े उनको उठाया हमने ।।

हर कोई आया, मिला और ज़ख्म देके गया ,
जिसको हमदर्द समझ पास बिठाया हमने ।।

बारहा बिखरे भी हम ताश के घर की मानिंद ,
फिर भी रिश्तों को सलीके से सजाया हमने ।।

अश्क़ पीते गए , ज़ख्मों को खुला छोड़ दिया ,
मुसकराहट में भी सौ दर्द छुपाया हमने ।।

हर एक वादा चुभा सौ बार जिगर में “राही”
मिट गए खुद मगर वादों को निभाया हमने ।।

आशुतोष त्रिपाठी !!

 

 

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ख़ता

क्या खता थी मेरी वो मुझको बताता भी नहीं ।
साथ रहता है मगर साथ निभाता भी नहीं ।।

पहले आदत सी लगा दी मुझे उसने अपनी ।
अब वो कहता है कि तुझसे मेरा नाता ही नहीं ।।

प्यार करता है मुझे इतना यकीं है लेकिन ।
अब हँसाता भी नहीं और रुलाता भी नहीं ।।

दिल पे पत्थर भी कभी काश मैं रख लूँ , लेकिन ।
दिल मे रहता है कभी दूर वो जाता ही नहीं ।।

दिल की हालत का बयाँ कैसे करें, “वो ” राही !
साथ रहता भी नहीं छोड़ के जाता भी नहीं ।।

” आशुतोष त्रिपाठी “