हौसले भी कम नही थे, ना इरादों में कमी थी।
भूख से लेकिन लड़े, वो इतना ताकतवर नहीं था।
सर छुपाता भी कहाँ से, संगदिल तूफान में वो।
रास्ते में सौ महल थे, उसका अपना घर नहीं था।।
नींद में चलने की आदत, उसको थी शायद पुरानी।
पर वो थक कर सो गया हो, ऐसा कोई पल नहीं था।।
पावँ के छाले दिखाता भी, तो वो कैसे दिखाता ।
उनपे जो मरहम लगाए, ऐसा भी रहबर नहीं था ।।
आशुतोष त्रिपाठी !
“आशु”
Category: Poetry
है स्वर्ग जो कहीं तो, कदमों में माँ है तेरे !
है जो कहीं तसल्ली, आँचल में माँ है तेरे !!
तूफ़ान से ग़मों के, जब भी मैं हार जाता ।
साया तेरा हर ग़म से, मुझको उबार लाता !
लाखों जतन किये हैं, माँ तूने मेरी ख़ातिर!
तुझ सा न और कोई, दुनियाँ में पाक नाता !!
गर है ख़ुदा जहाँ में, वो भी है तुझसे छोटा !
तू रूह में बसी है, वो तो है बस ज़ेहन में !!
जन्न्त तो नहीं देखी, पर ये मैं जानता हूँ ।
तेरी गोद को मैं, जन्न्त से बढ़ के मानता हूँ !
उम्र-ए-तमाम चल के अब, थक गया हूँ मैं माँ !
अब तो सुकूँ मिलेगा, आँचल में ही माँ तेरे !!
है स्वर्ग जो कहीं तो, कदमों में माँ है तेरे ..!!
आशुतोष त्रिपाठी
१०/०५/२०२०
मातृ दिवस
नया वर्ष..
पिछले अनुभव से सीख के कुछ
अगले पल में कुछ नया करें ।
हम उन्नति को संकल्पित हो
कुछ सृजन यहां पर नया करें !
कुछ बीते पल से सीख के हम
अगले पल का निर्माण करें ‘!
अब नये वर्ष की बेला में
हम नयी प्रकृति में प्राण भरें ।
अब तक लेना ही सीखा है ,
कुछ देना भी अब सीखें हम !!
अब तक तो जीतना सीखा है
औरों को जिताना सीखे हम ।
इस कोमल वसुंधरा का भी
हम पर कुछ कर्ज निकलता है ।
माँ पिता और गुरुजन पर भी
अपना कुछ फर्ज निकलता है !
अब सबका कर्ज चुकायें हम
बस अपना फर्ज निभायें हम ।
मधुमय यह नया वर्ष होवे
सुखमय यह नया वर्ष होवे !!
”आशुतोष त्रिपाठी ”
ऐसा माँ ही कर सकती है……..
कोई नज़्म लिखूँ! या गीत लिखूँ!या कोई कविता लिख जाऊँ?
अब तू ही बता मुझको ए दिल, कैसे मैं तुझको बहलाऊँ?
जाने कबसे मैं बैठा हूँ, इस बूढ़े बरगद के नीचे,
कुछ सोच रहा हूँ , या गुमसुम बस देख रहा आँखे मीचे।
खुलता ही नहीं कुछ आख़िर क्या, गड़बड़-झाला है अंतस में!
थोड़ा विमूढ़ – सा आखिर क्यूँ मैं बैठा हूँ मुट्ठी भींचे ?
हाँ याद आया! थोड़ा पहले एक नौजवान बेटे ने जब, माँ को यतीमखाने के दर पर रोता यूँ ही छोड़ दिया।
वो चला गया पीछे न मुड़ा, माँ रही देखती उसे, निरंतर ओझल होने तक अपलक ..!
फिर मैले आँचल से आँखों के गीले कोरों को पोंछा,
मन ही मन फिर आशीष दिया, अक्षम्य कार्य को क्षमा किया..
ऐसा माँ ही कर सकती है, आशीषों से भर सकती है!
चाहे सौ कष्ट पड़ें सहने, सौ बार उन्हें सह सकती है ऐसा माँ ही कर सकती है !!
“आशुतोष त्रिपाठी”
जुर्म औरों पे नहीं, ख़ुद पे किये जाते हैं ।
रोज़ मरते हैं मगर , फिर भी जिये जाते हैं।।
आह भरते हैं मगर अश्क़ नहीं दिखते हैं।
वक़्त बे वक़्त उन्हें याद किये जाते हैं ।।
बेरुखी इसको कहें, या कहें उनकी आदत।
टूट के मिलते तो हैं, पल में बिखर जाते हैं।।
आईने जैसा है हर शख़्श, गौर से देखो … ।
सबकी आंखों में अपने अक्स नज़र आते हैं।।
बारहा मिलने से, रिश्ते नहीं कायम होते ।
पल में लोगों के खयालात बदल जाते हैं..।।
वो सुख़नवर है, उसपे प्यार बहोत आता है।
ये और… है कि उसे संगदिल बुलाते हैं…!!
“आशुतोष त्रिपाठी”
फिर वो कहानी याद आयी
लो फिर वो कहानी याद आई ,
हर बात पुरानी याद आई ।
वो खेल पुराने याद आये ,
गलियाँ वो सुहानी याद आई ।
वो हरे भरे खेतों में जब गेहूँ की बालियाँ हसती थीं
हम नन्हें बच्चों की टोली जब उनमें जाकर छिपती थीं ।
सरसों के पीले फूलों की वो बाग़ सुहानी याद आई ..
वो दादी माँ की गोद में जब हम सर रखकर सो जाते थे,
कुछ काँपते से जब हाथ उनके जो बालों में फिर जाते थे ।
जन्नत से हसीन माँ के आँचल की छाँव सुहानी याद आई ….
वो खट्टे आमों पर ढेले बरसाती बच्चों की टोली
वो गाती कोयल जामुन पर वो मोर पपीहों की टोली।
वो बाँस के झुरमुट में जुगनुओं की मनमानी याद आई. ….
कितना अच्छा होता फिर से एक बार वो दिन वापस आता
इस समझौते के जीवन में कुछ पल तो खुद को जी पाता ?
पर सपना सा सब लगता है,
अब कहाँ वो दिन फिर आएगा !
जो फिर से गांव की झोली में बचपन के दिन दे जाएगा ………….।
”आशुतोष”
बावरा है मेरे मन तू ::::
बावरा है मेरे मन तू , तुझको क्या कुछ ज्ञात है ?
तू अभी कच्चा खिलाडी सारा जग निष्णात है !
भावनाओं के लिए कोई जगह खाली नहीं ,
स्वार्थपरता में यहां डूबा हुआ हर गात है !
रोज मानवता यहां सूली चढाई जा रही न्याय की हर रोज अब हस्ती मिटाई जा रही,
झूठ , मक्कारी की जै-जैकार होती रोज है ,
आज अच्छाई उठाती, इन सभी का बोझ है ।
राह पर जीवन की ‘राही’ हाँफता-सा चल रहा
सत्य की राहों पे चल कर पाँव उसका जल रहा
वो मजे से जा रहा है झूठ जिसके साथ है !
तू अभी कच्चा खिलाडी सारा जग निष्णात है!
बावरा है मेरे मन तू ,:
”आशुतोष ”
बचपन से किसको प्रेम नहीं !
कौन जल्दी बड़ा होना चाहता है !!
किन्तु अपेक्षाएँ लोगों की,और तुलनाएँ औरों से
कर देती हैं बड़ा; समय से पहले ।
कौन रोता नहीं है छुप छुप कर !
या कि दिल मचलता नहीं है माँ के आंचल को?
किन्तु ज़िम्मेदारियाँ या की विकलताएँ बड़ेपन की ?
कर देती हैं बड़ा समय से पहले, ज़िम्मेदारियाँ या कि विकलताएँ !!
जब कोई छोटा आ जाता है घर में।
तो घोषित हो जाता है स्वतः बड़प्पन !
और थोप – सी दी जाती है- गंभीरता, सहिष्णुता, सूझ-बूझ; न जाने क्या क्या !
और दबा दी जाती हैं, अंतर्मन की चंचलताएँ।
कर देती हैं बड़ा,समय से पहले ज़िम्मेदारियाँ या विकलताएँ !!
उम्र के पहले पड़ाव में भी कभी, कोसों दूर का वनवास; क्या विस्मृत हो जाता है बचपन का उल्लास?
नई, अनजान,वीरान दुनियाँ में चुपचाप; सहन-कर नित्य नए संताप।
चलाने की खातिर घर बार, स्वयं ही मिटना पड़ता है,भुलाकर सुरमय आकांक्षाएं।
कर देती हैं बड़ा समय से पहले, ज़िम्मेदारियाँ या विकलताएँ !!
स्वयं बन कर भी नींव की ईंट, सजाकर घर के कंगूरे, हृदय में अनुभव कर संतुष्टि,
सजाकर सबके सपनों को; समझकर उनको अब अपना, उन्हें अपनाना पड़ता है।
उम्र से पहले ही पडप्पन की चादर ओढ़कर, बड़े का फ़र्ज़ निभाना पड़ता है।
क्योंकि कर देती हैं बड़ा, समय से पहले; ज़िम्मेदारियाँ या विकलताएँ !!
आदरणीय अग्रज को समर्पित🙏
आशुतोष त्रिपाठी।।
फिर से याद तुम्हारी आयी!
फिर से लाख फसाने लायी।
चार क़दम की रंगरलियां थीं
फिर मीलों तन्हाई …..!
फिर से याद तुम्हारी आयी !
काश मैं उस दिन कह पाता, तुम रुक जाओ,
काश ये समझा पाता तुमको दुनियाँ से ना घबराओ!
पर किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ सा रहा देखता जाते तुमको,
पत्थर सा मैं रहा निरखता अविरल नीर बहाते तुमको ।
अब भी मन पर बोझ वही है, जाकर फिर तुम ना आईं !!
फिर से याद तुम्हारी आयी…..
रिक्त पड़ा है जीवन तबसे, जब तुमको था हँसते देखा;
अन्तिम बार वो जब अधरों को लज्जाशील लरज़ते देखा।
किन्तु दोष अब किसका मानूँ , ये मेरी ही नादानी थी,
हाथ तुम्हारा क्यूं कर छोड़ा, जान भी जाती गर जानी थी !!
वही भोगता हूँ अब, “राही” जो नियती है ले आयी….
फिर से याद तुम्हारी आयी…
“आशुतोष त्रिपाठी”
दरार ……!
दरार यूँ ही नहीं पड़ जाती है रिश्तों में !
ज़िम्मेदार होतीं हैं बेवजह की अपेक्षाएँ,आशाएँ,
जो हम थोप देते हैं औरों पर, अपनी इच्छाएँ ।
और देख लेते हैं दिवा स्वप्नों को –
हम बाँध देते हैं जिनसे चुपचाप अपनों को ।।
दरार यूँ ही नही पड़ जाती है रिश्तों में ,।
जब हम पाल लेते हैं मन में सैकड़ों शंकाएँ,
या फिर उलझ जाते हैं , अविश्वास की जड़ों में ।
भूल जाते हैं जब सारा प्रेम क्षणों में ।।
और देखने लगते हैं केवल बुराइयाँ, धीरे धीरे दूर हो जाती हैं सच्चाइयाँ ।
और रह जातें हैं फिर जलते हुए मन , व्यर्थ के जाल में उलझते हुए हम , स्वर्ग से घर को वीराना बना देते हैं ।
ख़ून के रिश्तों को बेगाना बना देते हैं, खून के रिश्तों को बेगाना बना देते हैं ।।
दरार …..
।। आशुतोष त्रिपाठी ।।