कोई नज़्म लिखूँ! या गीत लिखूँ!या कोई कविता लिख जाऊँ?
अब तू ही बता मुझको ए दिल, कैसे मैं तुझको बहलाऊँ?
जाने कबसे मैं बैठा हूँ, इस बूढ़े बरगद के नीचे,
कुछ सोच रहा हूँ , या गुमसुम बस देख रहा आँखे मीचे।
खुलता ही नहीं कुछ आख़िर क्या, गड़बड़-झाला है अंतस में!
थोड़ा विमूढ़ – सा आखिर क्यूँ मैं बैठा हूँ मुट्ठी भींचे ?
हाँ याद आया! थोड़ा पहले एक नौजवान बेटे ने जब, माँ को यतीमखाने के दर पर रोता यूँ ही छोड़ दिया।
वो चला गया पीछे न मुड़ा, माँ रही देखती उसे, निरंतर ओझल होने तक अपलक ..!
फिर मैले आँचल से आँखों के गीले कोरों को पोंछा,
मन ही मन फिर आशीष दिया, अक्षम्य कार्य को क्षमा किया..
ऐसा माँ ही कर सकती है, आशीषों से भर सकती है!
चाहे सौ कष्ट पड़ें सहने, सौ बार उन्हें सह सकती है ऐसा माँ ही कर सकती है !!
“आशुतोष त्रिपाठी”